भारत में हर 53 सेकंड में एक नवजात की मौत, 1000 में से 23 बच्चे 28 दिन भी नहीं जी पाते; नेपाल-बांग्लादेश भी हमसे बेहतर

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  • ​​​​यूएन के मुताबिक, भारत में 2018 में 5.50 लाख नवजात की मौत हुई, रोजाना 1600 से ज्यादा बच्चे
  • पाकिस्तान में नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 बच्चों पर 42, नेपाल में मृत्यु दर 19.9, बांग्लादेश में 17.1 और चीन में 4.3 
  • सैम्पल रजिस्ट्रेशन सिस्टम के मुताबिक, नवजात बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण जन्म के समय उनका कम वजन होना, इस वजह से 36% मौतें होती हैं

प्रियंक द्विवेदी

Jan 25, 2020, 04:26 PM IST

नई दिल्ली. राजस्थान में कोटा के जेकेलोन अस्पताल में पिछले 35 दिनों में 107 बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवाल खड़े हो गए हैं। इन बच्चों की मौत अस्पताल में पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिल पाने के कारण हो गई। दो साल पहले उत्तर प्रदेश के बीआरडी अस्पताल में भी ऑक्सीजन सप्लाई की कमी के चलते सिर्फ 5 दिन में 64 बच्चों की मौत हुई थी। यूनिसेफ के मुताबिक, भारत में हर 53 सेकंड में एक नवजात की मौत होती है यानी रोजाना 1600 से ज्यादा बच्चे। वहीं, देश में नियोनैटल मोर्टलिटी रेट यानी नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 बच्चों पर 23 है। यानी हर 1000 बच्चों में से 23 की मौत 28 दिन से पहले ही हो जाती है। जन्म के बाद 28 दिन बच्चे के सर्वाइवल के लिए सबसे अहम होते हैं।

 

पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बाद हम तीसरे नंबर पर

यूएन इंटर-एजेंसी ग्रुप फॉर चाइल्ड मोर्टेलिटी एस्टीमेशन (यूएन-आईजीएमई) के आंकड़ों के मुताबिक, भारत में 2018 में 5,49,227 बच्चों की मौत 28 दिन से पहले ही हो गई थी। देश में 2018 में नवजात मृत्यु दर प्रति 1000 बच्चों पर 23 की रही। नवजात मृत्यु दर के मामले में भारत पाकिस्तान और अफगानिस्तान के बाद 8 दक्षिण एशियाई देशों में तीसरे नंबर पर है। पाकिस्तान में ये दर प्रति 1000 बच्चों पर 42 और अफगानिस्तान में 37 है। वहीं, इस मामले में हम बांग्लादेश, नेपाल और भूटान जैसे देशों की स्थिति भी हमसे बेहतर है। जबकि, चीन में यही दर 4.3 है। 

 

2009 से 2013 के बीच बच्चों की मौत का आंकड़ा 20% घटा, 2014 से 2018 के बीच 17% कम हुआ

2009 में 28 दिन से पहले ही दम तोड़ने वाले बच्चों की संख्या 8,76,272 थी, जो अगल 5 साल यानी 2013 तक घटकर 7,02,444 हो गई। इस हिसाब से 2009 से 2013 के बीच बच्चों की मौत का आंकड़ा 20% घट गया। वहीं, 2014 में 6,65,563 बच्चों की मौत हुई थी, जिनकी संख्या 2018 में कम होकर 5,49,227 हो गई। लेकिन 2014 से 2018 के बीच बच्चों की मौत के आंकड़े में 17% की कमी आई। 


 

1 साल से कम उम्र के लाखों बच्चे भी हर साल मारे जाते हैं

यूएन-आईजीएमई के ही आंकड़ों के अनुसार, भारत में हर साल लाखों बच्चे 1 साल की उम्र से पहले ही मर जाते हैं। 1 साल से कम उम्र के बच्चों की मौत को इन्फैन्ट डेथ यानी शिशु मृत्यु कहते हैं। 2018 में देश में 7.20 लाख से ज्यादा बच्चे 1 साल भी नहीं जी पाए थे। इनमें 3.77 लाख से ज्यादा लड़के और 3.42 लाख से ज्यादा लड़कियां थीं। वहीं, हर साल 1000 में से 30 बच्चे ऐसे होते हैं, जो 1 साल की उम्र से पहले ही मर जाते हैं। इस मामले में भी हम बांग्लादेश से पीछे और पाकिस्तान से आगे हैं। बांग्लादेश में ये आंकड़ा 1000 बच्चों पर 27 का है जबकि पाकिस्तान में 59 का है। वहीं, 2009 से 2013 के बीच इन्फैन्ट डेथ में करीब 23% की कमी आई जबकि 2014 से 2018 के बीच मौत का आंकड़ा 21% कम हुआ।

10 साल में 95 लाख से ज्यादा बच्चों की मौत 1 साल की उम्र से पहले ही हुई


 

देश में 1456 लोगों पर 1 डॉक्टर

12 जुलाई 2019 को कांग्रेस सांसद डॉ. मोहम्मद जावेद के सवाल पर जवाब देते हुए स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन सिंह ने लोकसभा में बताया था कि, 31 मार्च 2019 तक देश में एलोपैथिक डॉक्टरों की संख्या 11,59,309 थी। इस हिसाब में देश में 1456 लोगों पर एक डॉक्टर है। जबकि, डब्ल्यूएचओ ने 1000 लोगों पर एक डॉक्टर का मानदंड तय किया है। हालांकि, उन्होंने डॉक्टरों की कमी के बारे में जानकारी नहीं दी थी। वहीं, डब्ल्यूएचओ की एक रिपोर्ट ‘हेल्थ वर्कफोर्स इन इंडिया’ में दावा किया गया था कि भारत में प्रैक्टिस कर रहे 57% डॉक्टरों के पास मेडिकल क्वालिफिकेशन ही नहीं है। हालांकि, सरकार ने इस रिपोर्ट को गलत बताया है। 

 

5 सबसे ज्यादा आबादी वाले देशों में क्या है हालत?

देश

आबादी

डॉक्टर प्रति 1000

चीन

138 करोड़

1.4

भारत

131 करोड़

0.6

अमेरिका

33.18 करोड़

2.5

इंडोनेशिया

26.49 करोड़

0.3

पाकिस्तान

21.07 करोड़

0.8

 

(सोर्स : जनसंख्या – यूएस सेन्सस ब्यूरो/ डॉक्टर प्रति 1000- डब्ल्यूएचओ)



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