हैदराबाद एनकाउंटर: घटना को नजीर की तरह लेने से न्याय प्रणाली ही धवस्त हो जाएगी

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हैदराबाद में महिला डॉक्टर के साथ जो घिनौनी घटना हुई, उसके लिए आरोपियों को सख्त से सख्त सज़ा यानी मौत की सज़ा ही मिलनी चाहिए थी, लेकिन अगर ये सज़ा कानून के दायरे में रहकर मिलती तो और अच्छा होता. अभी लोगों को भले ही इन आरोपियों को एनकाउंटर में मारा जाना अच्छा लग रहा होगा, लेकिन अगर इस फैसले को नज़ीर की तरह लिया गया तो यह ट्रेंड भविष्य में काफी खतरनाक साबित होगा और देश की पूरी न्याय प्रणाली ही धवस्त हो जाएगी. हालांकि इसका मतलब ये नहीं है कि मैं बलात्कारियों के पक्ष में बोल रहा हं, मैं सिर्फ कानून और देश के संविधान के पक्ष में बात रख रहा हूं. 

पहले बात करते है हैदराबाद एनकाउंटर की
इस एनकाउंटर को देखकर लगता है कि कहीं ना कहीं पुलिस ने अपनी कमी (सबूतों का अभाव) को छिपाने के लिए ये रास्ता अपनाया है क्योंकि जिस तरीके से ये अपराध हुआ, उसके बाद पुलिस ने तुरंत चारों को गिरफ्तार किया और फिर अदालत से रिमांड पर मिलते ही सबूत इकट्ठा करने के लिए देर रात घटनास्थल पर चारों आरोपियों को ले गए. बताया गया कि आरोपियों ने हथियार छीन भागने की कोशिश की और मारे गए. इस पूरी कहानी में ही कहीं ना कहीं झोल है. अगर पुलिस को सबूत इकट्ठे करने थे तो आरोपियों को दिन की रोशनी में ले कर जाती, क्योंकि रोशनी में ही पुलिस को आसानी से सबूत मिल पाते. 

रीकंस्ट्रक्शन यानी घटनाक्रम की जानाकारी लेना भी रोशनी में ज्यादा आसान रहता. अगर रात में मीडिया और लोगों से बचने के लिए गये थे तो सुरक्षा के पुरे इंतजाम कर के जाते जबकि ये चारों एक घिनौने अपराध में शामिल थे तो ज्यादा सर्तकता बरतनी चाहिए थी. हालांकि न्सयायिक जांच के बाद सच्चाई जल्द ही सामने आ जाएगी तब तक इस मामले को रहने देते हैं लेकिन सोचिये अगर 2008 में मुंबई पर हमला करने वाले आरोपी अजमल कसाब को भी एनकाउंटर में मार दिया गया होता तो कैसे हमले के पीछे पाकिस्तान बेनकाब होता. पुरी दुनिया के सामने हमने अपनी न्यायिक प्रणाली की अच्छी तस्वीर पेश की थी और उसी का परिणाम है कि पाकिस्तान आज टेरिरस्तान है.

इसलिए पुलिस एनकाउंटर पर सवाल
जरा जुलाई 2017 में शिमला में बच्ची के साथ बलात्कार और हत्या का केस याद कीजिए. कैसे पुलिस ने कुछ बेगुनाहों को गिरफ्तार किया था. एक लड़के की तो पुलिस हिरासत में पीट-पीटकर पुलिसकर्मियों ने ही हत्या कर दी थी. लोगों में भी गुस्सा था और आरोपियों को तुरंत सज़ा देने की मांग कर रहे थे, लेकिन जैसे ही मामला सीबीआई के पास पहुंचा पुरी तस्वीर ही बदल गई. जो आरोपी थे वो बेगुनाह निकले और खुद एक IG रैंक के अधिकारी और दूसरे 8 पुलिसकर्मी हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए. बाद में CBI ने असली आरोपी को भी गिरफ्तार किया और पता चला कि केस के दबाव में हिमाचल पुलिस ने बेगुनाहों को गिरफ्तार कर लिया था. 

दिसंबर 2012 के निर्भया केस के सभी आरोपियों को भी पकड़ने का पुलिस के ऊपर भारी दबाव था लेकिन दिल्ली पुलिस ने ना सिर्फ सभी 6 आरोपियों को गिरफ्तार किया बल्कि फांसी की सज़ा भी दिलवाई. एक आरोपी नाबालिग था जिस वजह से वो छुट गया और बाकि आरोपियों को उनके आखिरी अजांम तक पहुंचाने में कानून की पेचिदिगियों की वजह से समय लग रहा है लेकिन इसका मतलब कतई नहीं कि आरोपियों को सज़ा नहीं मिली. आज भी सभी आरोपी इसी डर के साये में जेल में बंद है कि कभी भी उन्हे फांसी पर लटकाया जा सकता है. एक आरोपी राम सिंह ने तो तिहाड़ जेल में आत्महत्या कर ली थी. हालांकि उसमें भी एक कहानी ये थी कि दूसरे कैदियों ने ही राम सिंह की हत्या कर दी थी क्योंकि जेल के अंदर बलात्कारियों के साथ अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता. 

किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए
हमारे देश का कानून कहता है कि भले ही किसी आरोपी को सज़ा देरी से मिले लेकिन किसी बेगुनाह को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए. जरा कठुआ में बच्ची के साथ हुये बलात्कार और हत्या की घटना को याद कीजिए. इस घटना के बाद देशभर में गुस्सा था. नेता, अभिनेता, मीडिया, जनता आरोपियों को सख्त से सख्त सज़ा देने की मांग कर रहे थे. अगर उस समय भी पुलिस जांचकर आरोपियों को अदालत ले जाने के बजाय एनकाउंटर में मार गिराती तो क्या विशाल जंगोत्रा बरी हो पाता? पुलिस ने अपनी चार्जशीट में बताया था कि आरोपी मौके पर मौजूद था और उसने बच्ची के साथ बलात्कार किया. पुलिस ने तीन गवाह भी पेश किए, लेकिन मेरठ में जहां रकर विशाल पढ़ाई कर रहा था उस घर की मकान मालकिन ने बताया कि घटना वाले दिन विशाल वहीं घर पर मौजूद था और इस बात की तस्दीक वो सीसीटीवी भी करते हैं जिसमें विशाल एटीएम से पैसे निकालते हुए दिखाई दिया था. 

इसी की एक दूसरी तस्वीर उत्तर प्रदेश के बदायूं में भी दिखाई दी थी, जहां दो बहनों ने फांसी लगाकर खुदकुशी की थी लेकिन शुरुआत में रेप और हत्या के आरोप में कुछ लोगों को पुलिस ने गिरफ्तार किया था, क्योंकि लोगों में गुस्सा था और उसी गुस्से के दबाव में पुलिस ने भी गिरफ्तारी की. बाद में मामला जांच के लिए CBI के पास गया और पता चला कि कोई रेप नहीं हुआ बल्कि दोनों लड़कियों ने आत्महत्या की थी. सोचिए अगर उसी गुस्से के दबाव में पुलिस गिरफ्तार आरोपियों का एनकाउंटर कर देती तो क्या होता? 

मेरा कहना ये नहीं है कि पुलिस के सभी एनकाउंटर फर्जी होते हैं लेकिन अपराधी कौन है, किस तरह का इस पर भी निर्भर करता है. ये मत भुलिये कि पुलिस को अपराधियों से निपटने की ट्रेनिंग मिलती है. पुलिस का पहला काम है अपराध को होने से रोकना और अपराधियों को गिरफ्तार कर उन्हें अदालत के सामने पेश कर सबूतों के आधार पर सज़ा दिलवाना.

क्यों बढ़ रहा है महिला अपराधों के लेकर गुस्सा
अब बात करते हैं लोगों में महिला अपराधों के लेकर बढ़ रहे गुस्से को लेकर. तो ये गुस्सा पुलिस की नाकामी के साथ-साथ हमारी न्याय प्रणाली में चल रही सुस्ती को लेकर है. दिसंबर 2012 में जिस तरह की घिनौनी वारदात हुई उसके बाद CrPC और IPC में बदलाव किए गए. पॉक्सो एक्ट बनाया गया और महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ हुये अपराध की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाई गई जिसका फायदा ये हुआ कि निचली अदालतों ने इस तरह के फैसलों में तेजी से सुनवाई की और फैसले भी दिए लेकिन कानून में प्रावधान है कि फांसी की सज़ा को हाईकोर्ट मंजूरी देता है और फिर उसके बाद आरोपी हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट और राष्ट्रपति के पास दया याचिका लगा सकता है. निचली अदालते भले ही फास्ट ट्रैक हो गई हो लेकिन ऊपरी अदालतें अभी भी स्लो ट्रैक पर चल रही है. और यही है लोगों में गुस्सा पनपने की असली वजह क्योंकि ऊपरी अदालतों में ऐसे मामलों को सुनकर खत्म करने की कोई समय सीमा तय नहीं है और इसी का फायदा उठा आरोपी सज़ा मिलने के बाद भी फायदा उठाते रहते हैं. 

दूसरी सबसे बड़ी वजह है कि अगर आरोपी एक से अधिक मामलों में आरोपी है तो आरोपी अधिकतम सज़ा से बचा रहता है. यानी अगर आरोपी को फांसी की सज़ा हो चुकी है लेकिन दूसरे किसी मामले में अदालत में सुनवाई चल रही है तो आरोपी को फांसी तब तक नहीं होगी, जब तक कि वो दूसरे मामलों में चल रही सुनवाई पुरी या फैसला ना आ जाए. 16 दिसंबर 2012 के सभी आरोपियों को बलात्कार और हत्या के मामले में निचली अदालत ने 13 सितंबर 2013 को ही फांसी की सज़ा सुना दी थी लेकिन अपहरण और लूट के मामले में आरोपियों को दो साल बाद अगस्त 2015 में 10 साल की सज़ा सुनाई गई. यानी फांसी की सज़ा का फैसला तब तक टला ही रहा और उसके बाद ऊपरी अदालतों में याचिका पर सुनवाई अलग. यानी अब वो समय आ गया कि सरकार और न्यायपालिका अपने फैसलों में तेजी लाये जिससे जनता में ये विश्वाश पैदा हो कि अगर किसी अपराधी ने कोई अपराध किया है तो उसे उसके किये की सज़ा भी तुरंत मिलेगी. कहावत है कि देरी से मिला न्याय अधूरा ही होता है और यहीं वज़ह है कि जनता हैदराबाद में आरोपियों को एनकाउंटर में मार दिए जाने पर खुशियां मना रही है क्योंकि जनता सरकार से न्याय की उम्मीद करती है. 

लेखक: जितेंद्र शर्मा, जी न्‍यूज में Editor Crime हैं.
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)  

 



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